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शबरी भीलण और रावण – संत आशाराम जी बापू

शबरी भीलण और रावण – संत आशाराम जी बापू

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Sabri bhilan ki sewa

 

गीता में आता है-स्वधर्म निधनं श्रेय…अपने धर्म में मर जाना अच्छा है… परधर्म भयावह…अपने धर्म में डँटे रहो…
अपने कर्म से भगवान् की पूजा करो,अपना धर्म निभाओ।शिष्य है तो गुरु की सेवा करना,गुरुआज्ञा मानना उसका धर्म है।शबरी भीलन थी,गुरु में श्रद्धा थी,गुरु वचन माथे रखती थी,झाड़ू भी लगाती थी तो गुरु की सेवा समझकर,अपने धर्म में डँटी रही…तो शबरी को रामजी के द्वार जाना नही पड़ा… रामजी पूछते-पूछते शबरी भीलण के द्वार आये।एकलव्य ने भी अपना धर्म पाला…भील का लड़का..अपना कर्तव्य पालता है…गुरु को गुरुदक्षिणा में अपना अंगूठा अर्पण किया।धनुर्विद्या में भले ही अर्जुन धनुर्धर हुए लेकिन गुरुभक्ति में तो एकलव्य का नाम सबकी जिव्हा पर आज भी है।

 

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